Friday, November 20, 2015

सोच का प्रदूषण


मित्रो !
        पर्यावरण प्रदूषण की समस्या तो अपनी जगह है ही। दुनियां के विभिन्न देश इसको कम करने के लिए सक्रिय भी हैं किन्तु विकृत विचारों, वैमनस्य, असहिष्णुता, आदि से हमारी सोच में होने वाला प्रदूषण एक बड़ी चिंता का विषय है। इसके चलते मानवता और भाईचारे के मूल्यों में लगातार ह्रास हो रहा है। 
        मेरा मानना है कि यदि ऐसे प्रदूषण पर नियंत्रण न पाया गया तब हमारी प्रगति शून्य हो जाएगी, हम असभ्य की श्रेणी में पहुँच जायेंगे और यदि ऐसा हुआ तब ईश्वर भी हमारी मदद नहीं करेगा क्योंकि वह अपनी संतानों से ऐसे कुत्सित आचरण की अपेक्षा नहीं करता। परमपिता ही क्या कोई भी पिता अपनी संतानों को आपस में लड़ता - झगड़ता नहीं देखना चाहता।


ईश प्रार्थना


मित्रो !
        ईश्वर की प्रार्थना के पहले भाग में हम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते हैं और उसकी स्तुति करते हैं, प्रार्थना के दूसरे भाग में हम अपने से जाने और अनजाने में हुयी त्रुटियों और अपराधों के लिए क्षमा माँगते हैं है। प्रार्थना के तीसरे भाग में अपने और सभी के लिये कल्याण की कामना करते हैं।
        प्रार्थना प्रायः कविता के रूप में होतीं हैं किन्तु यदि ईश्वर का स्मरण गद्य रूप में भी किया जाता है तब वह भी प्रार्थना ही होती है। अनेक धर्मों के अनुयायियों द्वारा की जाने वाली प्रार्थनाओं में यही तीन भाग होते हैं। 
        हे ईश्वर ! तू सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी है, तू दयालु है, सभी को क्षमा प्रदान करने वाला है, तू सभी का कल्याण करने वाला है। मैं तुझे प्रणाम करता हूँ। हे प्रभु ! मुझसे जाने और अनजाने में हुए अपराधों को क्षमा करें। मुझे सदमार्ग पर ले चलें और जगत का कल्याण करे, सभी सुखी और निरोगी हों।


वैवाहिक जीवन के कमजोर होते धागे : Weakening Marriage Relations

मित्रो !
        अनेक मामलों में जीवन भर, जनम-जनम या सात जनम तक साथ निभाने वाले वादों पर बने रिश्ते इसी जन्म में कुछ दूर चलकर ही दम तोड़ रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी अबोध संताने भी रिश्तों के बिखराव को रोक पाने में समर्थ नहीं हो पा रहीं हैं। मानवता, दया और करुणा भी इनके लिए कोई मायने रखते नहीं दिखाए दे रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इसके कारणों पर विश्लेषण किये जाने की आवश्यकता है।
       अभी हाल में ही एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र में एक समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार के अनुसार एक जिला स्तरीय न्यायालय जो तलाक के मामले की सुनवाई कर रहा था उसके द्वारा इस आशय की टिप्पणी की गयी थी कि तलाक के मामलों की बढ़ती संख्या एक चिंता का विषय है। उनके द्वारा यह भी टिप्पणी की गयी थी कि तलाक के अधिकांश मामले प्रोफेशनल्स से सम्बंधित हैं। 

      मित्रो एवं प्रियजनों ! उपर्युक्त संदर्भित समाचार के पढ़ने से पहले भी मेरा इस ओर ध्यान गया था और इस पर मैं एक पोस्ट लाना चाहता था। किन्तु अब तक इसे नहीं ला सका। मेरा विचार है कि इस सम्बन्ध में कारणों का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। यह विषय गंभीर चिंतन चाहता है। मैं इस विषय पर शीघ्र ही आर्टिकल लाना चाहूँगा। तब तक चिंता ही जाहिर कर सकता हूँ , यही कह सकता हूँ कि इस पर नियंत्रण पाया जाना समाज के हित में होगा।

    अभी हाल में ही तलाक का मुक़दमा सुन रहे एक न्यायालय ने तलाक के मामलों में बृद्धि पर चिंता व्यक्त की है। इसमें अधिकांश मामले पेशेवरों (professionals) के बताये गए हैं। तलाक का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर पड़ता है। विचारणीय यह है कि हम किस प्रकार के समाज की रचना करना चाहते हैं?



समझाया तर्क से जाता है और मनवाया बल से

मित्रो !
        तर्क संगत बात को सामान्य व्यक्ति से मनवाने के लिए बल की आवश्यकता नहीं होती। किसी बात को बलपूर्वक मनवाने की तीन परिस्थितियाँ ही हो सकती हैं, या तो श्रोता तर्क समझता न हो या समझना न चाहता हो या फिर बात तर्क की कसौटी पर खरी न उतर रही हो।
       तर्क संगत बात न समझने वाले लोगों में बच्चे और किसी भी उम्र के मन्दबुद्धि लोग हो सकते हैं। जो लोग तर्क संगत बात जानबूझकर नहीं समझना चाहते वे तर्क संगत बात कहने वाले व्यक्ति से ईर्ष्या रखने वाले, मिथ्या अभिमान करने वाले, सत्य को झुठलाने वाले या कही गयी बात से किसी प्रकार आहत होने वाले अथवा दायित्वों का निर्वहन न करने वाले व्यक्ति हो सकते हैं। इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों से तर्क संगत बात मनवाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता की बात तर्क संगत है। अन्य व्यक्ति तर्क संगत बात से सहमति व्यक्त कर उसे स्वीकार कर लेते हैं।


समतामूलक समाज की स्थापना


मित्रो !
        यदि हम समाज में समता चाहते हैं तब हमें समाज के वंचितों को उनके वे अधिकार जिनसे वे वंचित हैं उन्हें लौटाने होंगे और उनकी दूसरों पर निर्भरता समाप्त कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना होगा।


प्रिय वचन कड़वा क्यों लगता है


मित्रो !
        मीठे का स्वाद उन्हीं को कड़वा या कसैला लगता है जो अस्वस्थ होते हैं। यह बात विचारों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। मन और बुद्धि में विकार के रहते प्रिय वचन भी हमें कड़वा लगता है।
        अगर मन मैला नहीं है तब मीठे बोल सभी को प्रिय होते हैं। ऐसे में यदि हमें कोई प्रिय वचन कड़ुआ लग रहा है तब हमें अपने मन को टटोलना चाहिए और विकार का पता लगाकर उसे दूर करना चाहिए।


मध्यम वर्ग का वित्तीय प्रबंधन : Budget Management of Middle Class Family


मित्रो !

        मैं अपनी बात कहने से पूर्व देवियों से क्षमा माँगना चाहूँगा। मध्यम वर्गीय परिवारों के अधिकांश मामलों में देवियाँ ही शोपिंग करने जातीं हैं, कुछ मामलों में पुरुष और स्त्री दोनों ही जाते हैं। अन्य मामलों में पुरुष शोपिंग करने जाते हैं। अतः ऐसे पुरुषों जो घरेलू उपयोग की वस्तुओं की शॉपिंग करते है उनसे भी मैं क्षमा चाहूँगा। मेरा विचार है कि - 
       कुछ मध्यम वर्गीय परिवारों के लोग अपनी आय स्त्रोतों के अनुरूप आवश्यकता की वस्तुओं का आकलन किये बिना घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीद के लिए बड़े स्टोर्स में घुस जाते हैं। ऐसे लोग बिक्रेताओं द्वारा डिस्प्ले किये गए नए उत्पादों को देखकर अपने बजट पर ध्यान दिए बिना अतिरिक्त वस्तुओं की खरीद कर लेते हैं। कुछ लोग अपनी आवश्यकता की वस्तु की खरीद करते समय आकर्षक पैकिंग के झांसे में आकर अन्य ब्रांड की अधिक मूल्य की वस्तु खरीद लेते हैं। परिणाम यह होता है कि या तो उनको अन्य मदों में व्यय में कटौती करनी पड़ती है या फिर आय के अन्य स्त्रोत तलाश करने पड़ते हैं।         परिवार के खर्चे का बढ़ता बोझ परिवार के कमाऊ सदस्य के लिए तनाव का कारण बनता है। आय के अन्य स्त्रोतों की तलाश में कोई-कोई तो भृष्ट तरीकों को अपनाने को विवश हो जाते हैं। 
      ऐसे परिवारों के लिए मैं कहना चाहूँगा कि वे स्टोर्स में घुसने से पहले निम्नलिखित एक्सरसाइज अवश्य कर लें।
1. अपनी आवश्यकताओं को अपनी आय के अनुरूप चिन्हित करें।
2. आवश्यक वस्तुओं की उनके ब्रांड के साथ सूची तैयार कर लें। 
      ऐसा करने पर शॉपिंग में लगने वाले समय में कमी आएगी और आपका बजट भी नियंत्रित रहेगा। 
      अक्सर नए कीमती ब्रांड को इंट्रोड्यूस करने के लिए बड़े स्टोर्स पुराने कम मूल्य वाले ब्रांड हटा कर ग्राहकों को कीमती ब्रांड खरीदने के लिए विवश करते हैं। ऐसे में अगर नया ब्रांड आपके बजट के अनुरूप नहीं है तब आप कीमती ब्रांड उस स्टोर से क्रय न करके किसी अन्य दुकान जिस पर पुराना ब्रांड उपलब्ध हो से अपना पुराना ब्रांड क्रय करें। 
      आवश्यक मात्रा से अधिक मात्रा में वस्तुएं क्रय न करें। अगर मंहगाई बढ़ी हो तब पहले तो क्रय की जाने वाली वस्तुओं की सूची से कम आवश्यकता की वस्तुओं को हटाने पर विचार करें। यदि इससे काम न बन रहा हो तब क्रय की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा में कटौती पर विचार करें।
     किसी सरकार के वित्त मंत्री द्वारा बनाये गए बजट और घर के लिए गृहणी द्वारा बनाये गए बजट में अंतर होता है। वित्त मंत्री के पास जनता पर अतिरिक्त कर लगाकर अतिरिक्त आय जुटाने का साधन उपलब्ध रहता है किन्तु मध्यम या निम्न वर्गीय परिवारों के पास ऐसा विकल्प उपलब्ध नहीं होता।
      रसोई घर (kitchen) के मामले में हमें "बासी बचे न कुत्ता खाय।" कहाबत ध्यान में रखनी चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपनी आवश्यकता का ठीक प्रकार से आकलन कर लें ताकि पकाया हुआ भोजन व्यर्थ न जाय। इसको तैयार करने में लगने वाले मैटेरियल, ईधन, आदि के व्यय में मितव्यता बनी रहे। ऐसा करने पर आपकी व्यक्तिगत बचत के साथ - साथ देश के संसाधनों की भी बचत होगी। देश के लिए यह आपके द्वारा किया गया दान और योगदान होगा। मंहगाई को काबू में रखने के प्रति यह एक सार्थक प्रयास होगा। ऐसा करने से आपका अपना कल्याण होगा और गरीबों पर आपका उपकार होगा।


सांस्कृतिक संक्रमण की काली छाया

मित्रो !
        वैयक्तिक आज़ादी का सभी को हक़ है किन्तु हमें यह भी सोचना होगा कि वैयक्तिक आज़ादी का उपभोग इस तरह नहीं किया जाना चाहिए जिससे किसी अन्य व्यक्ति या समाज के हित प्रतिकूल रूप में प्रभावित हों। समाज के हितों की सुरक्षा का दायित्व भी हमारा है। अगर समाज के हित संरक्षित नहीं रहेंगे तब हम अलग-थलग पड़ जाएंगे और समाज में अराजकता फ़ैल जाएगी।

       मेरा विचार है कि भारतीय संस्कृति मानवीय रिश्तों को मजबूती प्रदान करती है। अतः भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर सुदृढ़ समाज की रचना नहीं हो सकती। मेरा सुझाव है कि हम अन्य संस्कारों को अपनाते समय अपने संस्कारों को न छोड़ें। इसी पृठभूमि में मैं निम्नलिखित विचार आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
       वैलेंटाइन डे, डेटिंग, लिविंग रिलेशनशिप, आदि भारतीय संस्कृति के छाये में विकसित हुए समाज से भिन्न सामाजिक परिवेश में विकसित हुए हैं। मेरा मानना है कि अपने संस्कारों को छोड़कर इनको अपनाने की स्थिति में हमारे समाज में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाएंगे।


अवगुण कैसे त्यागें

मित्रो !
        किसी भी अवगुण से छुटकारा पाने के लिए ऐसे अवगुण के प्रति अपने अन्दर घृणा का भाव पैदा करना अवगुण से छुटकारा पाने की दिशा में पहला कदम होता है।



शुभ दीपावली

    यह प्रकाश पर्व दीपावली नकारात्मक ऊर्जा का विनाश करे और हम सभी के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करे। सभी को दीपावली मंगलमय हो !!!


आओ ऐसा इक दीप जलायें

आओ ऐसा इक दीप जलायें।
बहें बयारें शान्ति ज्ञान की,
अन्धकार सब छँट जाए।
फट जाय तिमिर की काली चादर,
जग प्रकाशमय हो जाए।
आए मलयानिल से सुरभित सुगंध,
सौरभ जग में छा जाए।
छलके स्नेह अमिय की गागर,
डगर प्यार की आ जाए।
ऐसा भी एक दीप जले।
आओ ऐसा इक दीप जलाएं।


ईश्वर से याचना

हे ईश्वर !
           हमें ऐसा ज्ञान दो जिससे हम अवगुणों तथा पाप कर्मों को पहचान सकें, हमारे अन्दर उनके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न हो; हमें ऐसी शक्ति और सामर्थ्य दो जिससे हम सदगुणों को धारण करें और पाप कर्मों के करने से बचें।




प्राकृतिक संसाधन सभी के

मित्रो !
        परम न्यायी परम पिता यह कैसे कर सकता है कि वह अपनी कुछ सन्तानों को सारे संसाधन दे दे और शेष सन्तानों को संसाधन विहीन रखकर उन्हें साधन सम्पन्न सन्तानों की कृपा पर छोड़ दे।

        ईश्वर निष्पक्ष और न्यायी होने से भेदभाव नहीं करता। गरीब - अमीर, ऊँच - नीच की रचना मानव ने की है। कुछ लोगों को मानव ने ही प्राकृतिक संसाधनों से वंचित रखा है। वंचितों को उनका हक़ मिलना चाहिए।


नियंत्रण

मित्रो !
        लगाम वही कस सकता है जिसके हाथ में लगाम हो। कृष्ण जैसे सारथी और मित्र सभी नहीं होते।



बच्चों के प्रति अपराध चिंता का विषय


मित्रो !
      यों तो बच्चों के प्रति किसी भी प्रकार के अपराध का होना एक चिंता का विषय है किन्तु बच्चों के यौन शोषण सम्बन्धी अपराधों का बढ़ना विशेष चिंता का विषय है। बच्चों का यौन शोषण केवल अपराध ही नहीं उनके प्रति क्रूरता भी है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के द्वारा संकलित किये गए आंकड़ों से प्रकाश में आता है कि वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2014 में बच्चों के प्रति विभिन्न प्रकार के अपराधों में लगभग 50 प्रतिशत की बृद्धि हुयी है। वर्ष 2013 में जहाँ रिपोर्टेड अपराधों की संख्या 58224 रही थी वही 2014 में यह संख्या बढ़ कर 89423 हो गयी है। संकलित आंकड़ों के अनुसार इनमें से यौन शोषण (Rape and sexual assault) के मामलों की संख्या मामलों की कुल संख्या का लगभग 21.41 प्रतिशत दोनों वर्षों में रही है। यौन अपराधों के बढ़ने की दर 2012 की अपेक्षा 2013 में लगभग 45 % और 2013 की अपेक्षा 2014 में लगभग 55 % रही है। हम सभी जानते हैं कि अनेक कारणों से अपराधों के सभी मामले रिपोर्ट नहीं हो पाते हैं। वास्तविक आंकड़े इनसे कहीं अधिक होंगे। 
    यहाँ पर मेरा उद्देश्य बच्चों के प्रति होने वाले यौन शोषण के मामलों से सम्बंधित आंकड़ों के विश्लेषण करने का नहीं है और न ही मेरा उद्देश्य घटनाओं के प्रकाश में आने के बाद उन पर कार्यवाही की ओर ध्यान आकर्षित करने का है। मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए क्या कोई उपाय किये जा रहे हैं, यदि उपाय किये जा रहे हैं तब क्या वे पर्याप्त हैं, उन उपायों की जानकारी क्या सभी जनों को पहुंचाई जा रही है। यदि उपाय नहीं किये जा रहे हैं तब क्या उपाय किये जा सकते हैं। ऐसे उपाय कौन सुझाये? 
   लोग चिंतित तो दिख रहे हैं। यह बात समय समय पर विभिन्न लोगों द्वारा दिए गए वक्तब्यों यथा मोबाईल फोन के कारण ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, हमारे पहनाबे में बदलाव की बजह से ऐसे मामले बढ़ रहे हैं, आदि-आदि से जाहिर होता है। हो सकता है वे गलत कह रहे हों, हो सकता है उनमें कुछ सच्चाई भी हो किन्तु बिना विश्लेषण किये नकार देना सही नहीं कहा जा सकता है। मेरा मानना है कि इस विषय पर समाज सुधारकों, मनोवैज्ञानिकों और चिंतकों द्वारा उन कारणों का पता लगाया जाना चाहिए जिन कारणों से ऐसे मामलों में बृद्धि हो रही है। उन्हें सुरक्षात्मक उपाय भी सुझाना चाहिए। अविभावकों को ऐसे सुझावों पर कार्यवाही करनी चाहिए। इसी सन्दर्भ में मेरी यह पोस्ट प्रस्तुत है। 
   बच्चों के प्रति होने वाले योन अपराधों के प्रति समाज सुधारक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषक और चिंतक चुप क्यों हैं? अगर स्वेच्छा से कोई इस कार्य के लिए आगे नहीं आता तब क्या सरकार का दायित्व नहीं बनता कि वह इस विषय पर ऐसे लोगों की एक कमिटी गठित करे जो वर्तमान परिवेश में कारणों और सुरक्षात्मक उपायों पर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।


न्यायिक अपूर्णता


मित्रो !
      हमारी दण्ड प्रक्रिया में कहीं तो कमी है जिसका लाभ उठाकर समाज में कुछ लोग भय का माहौल बनाकर अत्याचार और दुराचार करते रहते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कोई भी व्यक्ति पुलिस और न्यायालय में जाने का साहस नहीं करता और अगर कोई साहस करता भी है तब गवाही के अभाव में ऐसे लोग बाइज्जत बरी हो जाते हैं।
    ऐसे लोग समाज में अराजकता फैलाते हैं, गरीबों का हक़ मारते हैं, उनके गुर्गे जनता का शोषण करते हैं। दूसरों की संपत्ति पर अवैध कब्जे करते हैं। अवैध कारोबार चलाते या चलवाते हैं। जनता से अवैध उगाही करते हैं।
    अनेक मामलों में ऐसे लोग लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव लड़कर जन प्रतिनिधि बन जाते हैं, अनेक राजनीतिक दल अपनी पार्टी में शामिल कर उन्हें टिकिट देकर लोक सभा या राज्य सभा में पहुंचने में मदद करते हैं। मजे की बात यह है कि विधायक या सांसद बन जाने के बाद वे पेंसन पाने के भी अधिकारी हो जाते हैं।
    ऐसे लोगों से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए अब तक किसी कारगर व्यवस्था व्यवस्था का न हो पाना चिंता का विषय है।


सत्य को बैसाखी की आवश्यकता नहीं : Truth Does Not Need Crutches


मित्रो !
        यह विचारणीय है कि असत्य को सत्य ठहराने के लिए असत्य का ढिंढोरा पीटना कहाँ तक उचित है। मेरा विचार है कि -
        असंख्य लोगों के उद्घोष से भी कोई असत्य सत्य नहीं हो जाता। सत्य तो है ही वही जो अस्तित्व में है। सत्य को बैसाखियों की आवश्यकता नहीं होती और असत्य को बैसाखियाँ लगाई ही नहीं जा सकतीं क्योंकि असत्य अस्तिवहीन होता हैं।